प्राचीन मंदिर · प्रागैतिहासिक गुफाएँ · चम्बल का जंगल
गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी — जहाँ 1,000 वर्ष पुराने मंदिर, संसद भवन की प्रेरणा और 25,000 वर्ष पुराने शैल चित्र एक साथ मिलते हैं
8वीं–10वीं शताब्दीभारत का भूला हुआ अंगकोर वाट
मुरैना से ~30 कि.मी.
11वीं शताब्दीभारतीय संसद भवन की प्रेरणा
मुरैना से ~40 कि.मी.
11वीं शताब्दीबिना किसी जोड़ के खड़ा — 1000 वर्षों से
मुरैना से ~25 कि.मी.
1978 में स्थापितघड़ियालों और डॉल्फिन का आखिरी गढ़
मुरैना से ~20-30 कि.मी.
8वीं–10वीं शताब्दीखजुराहो से दो शताब्दी पुरानी मूर्तिकला
मुरैना से ~35 कि.मी.
प्रागैतिहासिक (~25,000 वर्ष)25,000 वर्ष पुराने शैल चित्र
मुरैना से ~58 कि.मी.

भारत का भूला हुआ अंगकोर वाट
लगभग 200 बलुआ पत्थर के हिन्दू मंदिरों का विशाल समूह, जो गुर्जर-प्रतिहार शैली में 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच निर्मित हुए। ये मंदिर शिव, विष्णु और शक्ति को समर्पित हैं और लगभग 25 एकड़ में फैले हैं।

भारतीय संसद भवन की प्रेरणा
मिताओली गाँव की पहाड़ी पर स्थित यह गोलाकार मंदिर 64 योगिनियों को समर्पित है। कच्छपघात राजा देवपाल (1055-1075 ई.) द्वारा निर्मित, इसमें 64 छोटे कक्ष और केंद्र में खुला शिव मंदिर है। माना जाता है कि इसी की गोलाकार संरचना से नई दिल्ली के संसद भवन का डिज़ाइन प्रेरित हुआ।


बिना किसी जोड़ के खड़ा — 1000 वर्षों से
सिहोनिया में स्थित यह 11वीं शताब्दी का शिव मंदिर कच्छपघात शासक कीर्तिराज ने अपनी रानी ककनवती के लिए बनवाया था। इसकी सबसे अद्भुत विशेषता — विशाल पत्थर के खंड बिना किसी मसाले, चूने या सीमेंट के आपस में जुड़े हैं। मूल शिखर लगभग 100 फीट ऊँचा था।


घड़ियालों और डॉल्फिन का आखिरी गढ़
5,400 वर्ग कि.मी. में फैला यह त्रि-राज्यीय अभयारण्य (मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश) चम्बल नदी के किनारे स्थित है। यहाँ विश्व की सबसे बड़ी जंगली घड़ियाल आबादी, लुप्तप्राय गंगा डॉल्फिन और 316+ पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं।


खजुराहो से दो शताब्दी पुरानी मूर्तिकला
गढ़ी पदावली में 10वीं शताब्दी का शिव मंदिर मण्डप, 18वीं शताब्दी के गोहद के जाट राणाओं द्वारा बनाए गए किले के भीतर सुरक्षित है। इसकी नक्काशी अद्भुत है — रामायण, महाभारत, समुद्र मंथन, कृष्ण लीला और शिव तांडव के दृश्य उकेरे गए हैं। यहाँ की श्रृंगारिक मूर्तियाँ खजुराहो से लगभग दो शताब्दी पुरानी हैं।

25,000 वर्ष पुराने शैल चित्र
1979 में खोजी गई ये प्रागैतिहासिक शैलाश्रय 600+ शैल चित्रों का खज़ाना हैं। 'लिखीछज' नामक मुख्य शैलाश्रय 100+ फीट चौड़ा है। लाल और सफेद गेरू रंग से बने ये चित्र — नृत्य, शिकार, हाथी की सवारी, ढाल-हथियार लिए मानव आकृतियाँ दर्शाते हैं। यहाँ मिले शुतुरमुर्ग अंडे के छिलकों की रेडियोकार्बन तिथि ~25,000 वर्ष है।
ये स्थल हमारे पूर्वजों की भूमि के गवाह हैं। चम्बल की घाटी से लेकर प्रतिहार मंदिरों तक — यही वह धरती है जहाँ दंडोतिया वंश ने अपनी जड़ें जमाईं।
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